गेहूं बुवाई की हालत चिंताजनक, 30 लाख हेक्टेयर तक पिछड़ी
कहीं नमी की कमी से तो कहीं बारिश से प्रभावित हुई गेहूं की बुवाई
राम जी की माया कहीं धूप कहीं छाया। भला हो इस कहावत का। देश में जब मानसूनी बादल खूब पानी बरसा रहे थे तो लगा अगला सीजन रबी खूब फले फूलेगी। लेकिन हालत उलटबांसियों की सी हो गई है। जहां खूब पानी बरसा वहां नमी थी, लेकिन बुवाई से ठीक पहले फिर बारिश हो गई। और जिन इलाकों में मानसून ने दगा दिया था वहां के किसानों ने सोचा इस मौसम में थोड़ी बहुत बारिश तो हो ही जाएगी। लेकिन इस सीजन में भी बूंदे नहीं टपकीं। किसानों ने गेहूं बोने के लिए खेत में पलेवा कर डाला। अब वहां भी गेहूं की बुवाई लेट। यानी दोनों जगहों पर गेहूं की बुवाई पीछे। गेहूं की बुवाई पिछड़ने की एक कहानी और। पश्चिम उत्तर प्रदेश की चीनी मिलें नहीं चलीं तो उनकी मुश्किल यह हो गई कि पेड़ी गन्ने वाले खेत ही खाली नहीं हो पाये। आगे भी संभावना नहीं है। यह कोई कम रकबा नहीं है। सरकारी आंकड़ों पर जाएं तो कोई नौ दस लाख एकड़ है।
गेहूं कारकबा पिछले साल के मुकाबले सर्वाधिक 30 लाख हेक्टेयर तक पिछड़ चुका है। बुवाई में देरी होने से गेहूं की उत्पादकता पर विपरीत असर पडऩे का खतरा है। इसे लेकर कृषि मंत्रालय के माथे पर भी बल पडऩे लगे हैं।
मानसून की अच्छी बारिश के चलते भूमि में पर्याप्त नमी को लेकर कृषि वैज्ञानिक व सरकार बेहद खुश थे। उम्मीद थी कि रबी की प्रमुख फसल गेहूं की बुवाई इस बार जल्दी हो जाएगी, जिससे उत्पादकता बढ़ेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गेहूं उत्पादक राज्यों- पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मानसून की अच्छी बारिश हुई थी। इससे वहां की भूमि में पर्याप्त नमी को देखते हुए बुवाई तेजी से शुरू तो हुई, लेकिन अचानक हुई बारिश ने उसे रोक दिया है। हरियाणा में गेहूं बुवाई ढाई लाख हेक्टेयर पीछे है, जबकि पंजाब में डेढ़ लाख हेक्टेयर।
इसके विपरीत पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ में पर्याप्त बारिश नहीं होने से खरीफ की फसलों पर विपरीत असर पड़ा था। जिससे खेतों में पलेवा (सिंचाई) करने के बाद ही बुवाई संभव हो पा रही है। परिणामस्वरूप यहां भूमि में नमी की कमी से बुवाई पिछड़ रही है।
कहीं सूखा कहीं बारिश के चलते उत्तर प्रदेश में पिछले साल अब तक जहां 30 लाख हेक्टेयर भूमि में गेहूं बो दिया गया था, वहां अभी तक केवल नौ लाख हेक्टेयर में ही गेहूं की बुवाई हो सकी है। कृषि मंत्रालय के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है।
कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में गेहूं बुवाई पांच लाख हेक्टेयर पीछे चल रही है। पिछले साल अब तक 17.71 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बुवाई हो चुकी थी, जो चालू सीजन में 12.50 लाख हेक्टेयर ही हो पाई है। छत्तीसगढ़ में 80 फीसदी और महाराष्ट्र में 35 फीसदी कम रकबा में बुआई हुई है।
Tuesday, November 23, 2010
Monday, October 18, 2010
दालों के लिए अब नई मशक्कत
दलहन गांव के बाद अब बसेंगे बीज ग्राम
देश के गोदाम गेहूं व चावल से अटे पड़े हैं। लेकिन दाल की कटोरी विलायत की दाल से ही भर रही है। विदेशी मुद्रा खर्च करके सरकार आजिज आ चुकी है। फिर भी बात नहीं बन रही है। थक हार कर अधिक दलहन उगाने की मशक्कत शुरू की गई है। किसानों का रोना है कि उन्हें अच्छे बीज ही नहीं मिल पा रहा है। जबकि सरकारी कृषि वैज्ञानिकों की फेहरिस्त में कई सौ वेरायटी तैयार हैं। यह है सरकारी अंतरविरोध। इसी को दूर करने के लिए सरकार ने नई योजना चालू की है। कुछ नमूने आप भी देख लें।
सरकार की कोशिशें कामयाब हुईं तो आने वाले सालों में रोटी के साथ दाल भी मयस्सर हो सकती है। देश में दाल की कमी और उसकी बढ़ती कीमतों से परेशान सरकार सारे विकल्पों को खंगालने में जुट गयी है। इसके तहत पहले दलहन ग्राम और अब बीज ग्राम बसाने की योजना पर अमल शुरू कर दिया गया है।
दलहन खेती को लाभप्रद बनाने और प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को उनके गांव में ही अच्छे व उन्नत फाउंडेशन बीज मुहैया कराने की योजना है। योजना के तहत गांव के किसानों को ही लघु बीज गोदाम स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। दलहन बीजों के भंडारण के लिए उन्हें उचित भाड़ा भी दिया जाएगा। किसानों को दलहन की वैज्ञानिक खेती का मुफ्त प्रशिक्षण देने की भी योजना है। यह योजना राज्यों के कृषि ïिवभाग, कृषि विश्वविद्यालय और राज्य बीज निगम के साझा प्रयास से संचालित की जाएगी।
योजना के तहत दलहन खेती के इच्छुक किसानों को प्रति आधा एकड़ खेत के लिए जरूरी फाउंडेशन बीजों की आपूर्ति 50 फीसदी के सब्सिडी मूल्य पर की जाएगी। पहले चरण में किसानों को प्रशिक्षित करने की योजना है, जिसमें 150 किसानों के समूह को प्रशिक्षण देने के लिए 15 हजार रुपये का प्रावधान किया गया है।
दलहन बीजों के भंडारण के लिए जो किसान अपने स्तर पर गोदाम बनाकर बीजों की भंडारण करेंगे, उन्हें 1500 से 3000 रुपये का भाड़ा दिया जाएगा। यह भाड़ा 10 और 20 क्विंटल दलहन बीजों पर मिलेगा। अनुसूचित व अनुसूचित जनजाति के किसानों को देय भाड़े की राशि सामान्य वर्ग के किसानों के मुकाबले अधिक होगी।
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देश के गोदाम गेहूं व चावल से अटे पड़े हैं। लेकिन दाल की कटोरी विलायत की दाल से ही भर रही है। विदेशी मुद्रा खर्च करके सरकार आजिज आ चुकी है। फिर भी बात नहीं बन रही है। थक हार कर अधिक दलहन उगाने की मशक्कत शुरू की गई है। किसानों का रोना है कि उन्हें अच्छे बीज ही नहीं मिल पा रहा है। जबकि सरकारी कृषि वैज्ञानिकों की फेहरिस्त में कई सौ वेरायटी तैयार हैं। यह है सरकारी अंतरविरोध। इसी को दूर करने के लिए सरकार ने नई योजना चालू की है। कुछ नमूने आप भी देख लें।
सरकार की कोशिशें कामयाब हुईं तो आने वाले सालों में रोटी के साथ दाल भी मयस्सर हो सकती है। देश में दाल की कमी और उसकी बढ़ती कीमतों से परेशान सरकार सारे विकल्पों को खंगालने में जुट गयी है। इसके तहत पहले दलहन ग्राम और अब बीज ग्राम बसाने की योजना पर अमल शुरू कर दिया गया है।
दलहन खेती को लाभप्रद बनाने और प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को उनके गांव में ही अच्छे व उन्नत फाउंडेशन बीज मुहैया कराने की योजना है। योजना के तहत गांव के किसानों को ही लघु बीज गोदाम स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। दलहन बीजों के भंडारण के लिए उन्हें उचित भाड़ा भी दिया जाएगा। किसानों को दलहन की वैज्ञानिक खेती का मुफ्त प्रशिक्षण देने की भी योजना है। यह योजना राज्यों के कृषि ïिवभाग, कृषि विश्वविद्यालय और राज्य बीज निगम के साझा प्रयास से संचालित की जाएगी।
योजना के तहत दलहन खेती के इच्छुक किसानों को प्रति आधा एकड़ खेत के लिए जरूरी फाउंडेशन बीजों की आपूर्ति 50 फीसदी के सब्सिडी मूल्य पर की जाएगी। पहले चरण में किसानों को प्रशिक्षित करने की योजना है, जिसमें 150 किसानों के समूह को प्रशिक्षण देने के लिए 15 हजार रुपये का प्रावधान किया गया है।
दलहन बीजों के भंडारण के लिए जो किसान अपने स्तर पर गोदाम बनाकर बीजों की भंडारण करेंगे, उन्हें 1500 से 3000 रुपये का भाड़ा दिया जाएगा। यह भाड़ा 10 और 20 क्विंटल दलहन बीजों पर मिलेगा। अनुसूचित व अनुसूचित जनजाति के किसानों को देय भाड़े की राशि सामान्य वर्ग के किसानों के मुकाबले अधिक होगी।
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बेमौत मारे जाते हैं बेजुबान
मौत से बचने वाले पशु अपाहिज और लाचार होकर हो जाते हैं बेकार
देश के करोड़ों बेजुबान हर साल बेमौत मारे जाते हैं, लेकिन उनकी आह और कराह किसी को सुनवाई नहीं पड़ती है। सरकारी आंकड़े को ही सही मान लें तो हर साल कोई २० हजार करोड़ रुपये की लागत का पशुधन संक्रामक बीमारियों की भेंट चढ़ जाता है। इसके लिए सरकार का फंड ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर ही है। देश में कोई तीन चार संस्थान ही हैं, जहां गिनती के पशु चिकित्सक तैयार होते हैं, उनमें से भी ज्यादातर विदेश का रुख कर लेते हैं। यहां तो सब कुछ नीम हकीम खतरे जान है। यह रिपोर्ट भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉक्टर एमसी. शर्मा से बातचीत पर आधारित है। हजारों करोड़ रुपये का जो नुकसान आप देख रहे हैं, वह तो सिर्फ पशुओं के संक्रामक रोग है। जाने कितने औ रोग हैं, जिनका जिक्र कभी और किसी रिपोर्ट में देने की कोशिश करुंगा।
हर बार की तरह इस साल (२०१०-११) भी टीके के अभाव में करोड़ों पशु मुंहपका- खुरपका रोग से मरने के लिए अभिशप्त हैं। देश में इसका टीका बनाने वाली कंपनियों की उत्पादन क्षमता मांग के मुकाबले बहुत कम है। यही वजह है कि अब तक केवल 54 जिलों में ही पशुओं का संपूर्ण टीकाकरण हो सका है, बाकी भगवान भरोसे हैं। जबकि यह इतना खतरनाक रोग है कि जो पशु मौत से बच भी जाते हैं, वे अपाहिज व लाचार होकर किसी काम के नहीं रहते।
पिछले साल ही देश पूरे देश में मुंहपका-खुरपका रोग फैला था। लेकिन इन बेजुबानों की मौत पर देश के किसी कोने से कोई आह तक नहीं निकली। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस रोग से सालाना पांच से 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है। देश में केवल 54 ऐसे जिले हैं जहां इस रोग का प्रकोप नहीं हुआ था। इनका संबंध हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से है। यहां शत प्रतिशत पशुओं का टीकाकरण हो चुका है। इन जिलों को छोड़कर देश के बाकी जिलों में पशुओं की जान 'राम भरोसेÓ है। यहां टीके की भारी किल्लत है।
भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉक्टर एमसी. शर्मा का कहना है कि सितंबर से नंवबर के महीने में पशुओं में 'खुरपका व मुंहपकाÓ रोग के फैलने की आशंका सबसे अधिक होती है। पशुओं के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। इसके वायरस अत्यधिक गरमी, अत्यधिक जाड़ा अथवा ज्यादा बारिश के समय तेजी से सक्रिय होते हैं। चारे का अभाव, कीचड़ व भीगने से पशुओं में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता कम हो जाती है, जिससे इसका प्रकोप और तेज हो जाता है। समूचे देश और पूरे एशिया में यह वायरस सक्रिय है। मुंहपका में पशु के मुंह में छाले, जीभ में घाव, अल्सर और मुंह से लगातार लार टपकती रहती है। जबकि खुरपका में पशु के खुर के बीच में घाव हो जाता है और उसमें कीड़े पड़ जाते हैं। कहने को ये दो रोग हैं, मगर इनका वायरस एक है, लिहाजा टीका भी एक है।
इस वायरस के प्रभाव से मादा पशु के साथ सांड की प्रजनन क्षमता खत्म हो जाती है। नर पशु की कार्य क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। दुधारू पशु दूध देना बंद कर देते हैं। डॉक्टर शर्मा का कहना है कि छोटे पशुओं में 20 फीसदी और बड़े पशुओं में 10 फीसदी तक के प्रभावित होने की आशंका रहती है। गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सूअरों के अलावा जंगली हिरनों में इसका प्रकोप सर्वाधिक होता है।
पशुओं के इस संक्रामक रोग पर काबू पाने के लिए सरकार ने आधा अधूरा प्रयास शुरू किया है। इसके तहत देश के 270 जिलों को टीकाकरण योजना में शामिल किया गया है। लेकिन कब तक वहां टीका पहुंचेगा इसका जवाब मंत्रालय में किसी के पास नहीं है। देश में पशुओं के टीकाकरण के लिए सालाना 60 लाख टीके चाहिए। लेकिन उत्पादन सिर्फ 10 लाख टीकों का ही हो पाता है।
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देश के करोड़ों बेजुबान हर साल बेमौत मारे जाते हैं, लेकिन उनकी आह और कराह किसी को सुनवाई नहीं पड़ती है। सरकारी आंकड़े को ही सही मान लें तो हर साल कोई २० हजार करोड़ रुपये की लागत का पशुधन संक्रामक बीमारियों की भेंट चढ़ जाता है। इसके लिए सरकार का फंड ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर ही है। देश में कोई तीन चार संस्थान ही हैं, जहां गिनती के पशु चिकित्सक तैयार होते हैं, उनमें से भी ज्यादातर विदेश का रुख कर लेते हैं। यहां तो सब कुछ नीम हकीम खतरे जान है। यह रिपोर्ट भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉक्टर एमसी. शर्मा से बातचीत पर आधारित है। हजारों करोड़ रुपये का जो नुकसान आप देख रहे हैं, वह तो सिर्फ पशुओं के संक्रामक रोग है। जाने कितने औ रोग हैं, जिनका जिक्र कभी और किसी रिपोर्ट में देने की कोशिश करुंगा।
हर बार की तरह इस साल (२०१०-११) भी टीके के अभाव में करोड़ों पशु मुंहपका- खुरपका रोग से मरने के लिए अभिशप्त हैं। देश में इसका टीका बनाने वाली कंपनियों की उत्पादन क्षमता मांग के मुकाबले बहुत कम है। यही वजह है कि अब तक केवल 54 जिलों में ही पशुओं का संपूर्ण टीकाकरण हो सका है, बाकी भगवान भरोसे हैं। जबकि यह इतना खतरनाक रोग है कि जो पशु मौत से बच भी जाते हैं, वे अपाहिज व लाचार होकर किसी काम के नहीं रहते।
पिछले साल ही देश पूरे देश में मुंहपका-खुरपका रोग फैला था। लेकिन इन बेजुबानों की मौत पर देश के किसी कोने से कोई आह तक नहीं निकली। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस रोग से सालाना पांच से 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है। देश में केवल 54 ऐसे जिले हैं जहां इस रोग का प्रकोप नहीं हुआ था। इनका संबंध हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से है। यहां शत प्रतिशत पशुओं का टीकाकरण हो चुका है। इन जिलों को छोड़कर देश के बाकी जिलों में पशुओं की जान 'राम भरोसेÓ है। यहां टीके की भारी किल्लत है।
भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉक्टर एमसी. शर्मा का कहना है कि सितंबर से नंवबर के महीने में पशुओं में 'खुरपका व मुंहपकाÓ रोग के फैलने की आशंका सबसे अधिक होती है। पशुओं के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। इसके वायरस अत्यधिक गरमी, अत्यधिक जाड़ा अथवा ज्यादा बारिश के समय तेजी से सक्रिय होते हैं। चारे का अभाव, कीचड़ व भीगने से पशुओं में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता कम हो जाती है, जिससे इसका प्रकोप और तेज हो जाता है। समूचे देश और पूरे एशिया में यह वायरस सक्रिय है। मुंहपका में पशु के मुंह में छाले, जीभ में घाव, अल्सर और मुंह से लगातार लार टपकती रहती है। जबकि खुरपका में पशु के खुर के बीच में घाव हो जाता है और उसमें कीड़े पड़ जाते हैं। कहने को ये दो रोग हैं, मगर इनका वायरस एक है, लिहाजा टीका भी एक है।
इस वायरस के प्रभाव से मादा पशु के साथ सांड की प्रजनन क्षमता खत्म हो जाती है। नर पशु की कार्य क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। दुधारू पशु दूध देना बंद कर देते हैं। डॉक्टर शर्मा का कहना है कि छोटे पशुओं में 20 फीसदी और बड़े पशुओं में 10 फीसदी तक के प्रभावित होने की आशंका रहती है। गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सूअरों के अलावा जंगली हिरनों में इसका प्रकोप सर्वाधिक होता है।
पशुओं के इस संक्रामक रोग पर काबू पाने के लिए सरकार ने आधा अधूरा प्रयास शुरू किया है। इसके तहत देश के 270 जिलों को टीकाकरण योजना में शामिल किया गया है। लेकिन कब तक वहां टीका पहुंचेगा इसका जवाब मंत्रालय में किसी के पास नहीं है। देश में पशुओं के टीकाकरण के लिए सालाना 60 लाख टीके चाहिए। लेकिन उत्पादन सिर्फ 10 लाख टीकों का ही हो पाता है।
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Tuesday, August 10, 2010
सरकारी उलटबांसियां
खपरैल वाली झोपड़ी सरकार के लिए 'पक्का' मकान
ईंट की दीवारों से बना आशियाना हुआ 'कच्चा' मकान
उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के गरीबों का नुकसान, इंदिरा आवास योजना के लाभ से वंचित
कबीरदास की उलटबांसियां पढ़ते थे तो लगता है बेवजह का मजाक बक रखा है कबीर ने। लेकिन आंखों से देखा तो टकटकी ही लगी रही, वह भी भारत सरकार की। कागज पर जो लिख उठा, उसे पत्थर की लकीर मानिये। पिछले एक दशक पहले मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों की झोपडि़यों को सरकारी मुलाजिमों ने पक्का मकान लिख रखा है। इसे ठीक कराने वहां के मुख्यमंत्री ने न जाने कितनी बार दिल्ली का चक्कर लगा लिया। लेकिन ग्रामीण विकास मंत्रालय वालों को कहना है कि इसे तो योजना आयोग ठीक करेगा, उससे पूछा तो जवाब टका सा। भाई यह गलती है तो इस पंचवर्षीय योजना में तो ठीक नहीं होती। इंतजार करिये १२वीं योजना की। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने भी चिट्ठियां लिख रखा है। आप भी उनकी कारस्तानी के कुछ नमूने देखिए....
कच्ची दीवार और खपरैल को आप क्या मानेंगे? कच्चा या पक्का। सरकार तो इसे 'पक्का मकान' मानती है जबकि ईंट की दीवारों से बने मकान को 'कच्चा'। उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश को गरीबों को इसी उलटबांसी का नुकसान उठाना पड़ा है। इंदिरा आवास योजना में सबसे वह गरीब बाहर हो गई जिन्होंने अपनी कच्ची मड़ैया को खपरैल से ढकने की 'गलती' की थी।
देश के इन दोनों बड़े सूबों के गरीब इंदिरा आवास योजना के लाभ का लेने में केरल और बिहार जैसे राज्यों से भी पिछड़ गये हैं। जबकि देश के कुछ दूसरे राज्यों के लोग समझदार निकले। उन्होंने अपने ईंट व सीमेंट से बने मकानों की छत पर पुआल व पशु चारा रख कर उसे कच्चे मकान की श्रेणी में दर्ज करा लिया। मकानों के वर्गीकरण में घालमेल का यह नतीजा सालों बाद समझ में आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अनुसूचित जनजाति बहुल ब्लॉकों में 99 फीसदी मकान कच्ची मिट्टी अथवा घासफूस के बने हैं लेकिन ज्यादातर झोपडि़यों को खपरैल से ढका होने के कारण पक्का मान लिया गया है। ऐसे मकान वाले गरीबों को इंदिरा आवास योजना का लाभ नहीं मिल पाया है। मध्य प्रदेश ने पिछले साल 1.14 लाख बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया तो उत्तर प्रदेश ने 4.93 लाख इंदिरा आवास बनाने का। इसके मुकाबले बिहार जैसे राज्य में गरीबों के लिए मकानों का लक्ष्य 10.98 लाख रहा।
इंदिरा आवास योजना में उन्हीं गरीबों को मकान बनाने के लिए सरकारी मदद मिलती है, जिनके मकान कच्चे हों अथवा वे बेघर हों। इसका निर्धारण भी जनगणना के आंकड़ों और योजना आयोग सर्वेक्षण से होता है। कच्चे-पक्के मकानों की इस परिभाषा के चलते बड़े राज्यों के गरीब सस्ती आवास योजनाओं का लाभ लेने में लगातार पिछड़ रहे हैं।
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ईंट की दीवारों से बना आशियाना हुआ 'कच्चा' मकान
उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के गरीबों का नुकसान, इंदिरा आवास योजना के लाभ से वंचित
कबीरदास की उलटबांसियां पढ़ते थे तो लगता है बेवजह का मजाक बक रखा है कबीर ने। लेकिन आंखों से देखा तो टकटकी ही लगी रही, वह भी भारत सरकार की। कागज पर जो लिख उठा, उसे पत्थर की लकीर मानिये। पिछले एक दशक पहले मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों की झोपडि़यों को सरकारी मुलाजिमों ने पक्का मकान लिख रखा है। इसे ठीक कराने वहां के मुख्यमंत्री ने न जाने कितनी बार दिल्ली का चक्कर लगा लिया। लेकिन ग्रामीण विकास मंत्रालय वालों को कहना है कि इसे तो योजना आयोग ठीक करेगा, उससे पूछा तो जवाब टका सा। भाई यह गलती है तो इस पंचवर्षीय योजना में तो ठीक नहीं होती। इंतजार करिये १२वीं योजना की। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने भी चिट्ठियां लिख रखा है। आप भी उनकी कारस्तानी के कुछ नमूने देखिए....
कच्ची दीवार और खपरैल को आप क्या मानेंगे? कच्चा या पक्का। सरकार तो इसे 'पक्का मकान' मानती है जबकि ईंट की दीवारों से बने मकान को 'कच्चा'। उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश को गरीबों को इसी उलटबांसी का नुकसान उठाना पड़ा है। इंदिरा आवास योजना में सबसे वह गरीब बाहर हो गई जिन्होंने अपनी कच्ची मड़ैया को खपरैल से ढकने की 'गलती' की थी।
देश के इन दोनों बड़े सूबों के गरीब इंदिरा आवास योजना के लाभ का लेने में केरल और बिहार जैसे राज्यों से भी पिछड़ गये हैं। जबकि देश के कुछ दूसरे राज्यों के लोग समझदार निकले। उन्होंने अपने ईंट व सीमेंट से बने मकानों की छत पर पुआल व पशु चारा रख कर उसे कच्चे मकान की श्रेणी में दर्ज करा लिया। मकानों के वर्गीकरण में घालमेल का यह नतीजा सालों बाद समझ में आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अनुसूचित जनजाति बहुल ब्लॉकों में 99 फीसदी मकान कच्ची मिट्टी अथवा घासफूस के बने हैं लेकिन ज्यादातर झोपडि़यों को खपरैल से ढका होने के कारण पक्का मान लिया गया है। ऐसे मकान वाले गरीबों को इंदिरा आवास योजना का लाभ नहीं मिल पाया है। मध्य प्रदेश ने पिछले साल 1.14 लाख बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया तो उत्तर प्रदेश ने 4.93 लाख इंदिरा आवास बनाने का। इसके मुकाबले बिहार जैसे राज्य में गरीबों के लिए मकानों का लक्ष्य 10.98 लाख रहा।
इंदिरा आवास योजना में उन्हीं गरीबों को मकान बनाने के लिए सरकारी मदद मिलती है, जिनके मकान कच्चे हों अथवा वे बेघर हों। इसका निर्धारण भी जनगणना के आंकड़ों और योजना आयोग सर्वेक्षण से होता है। कच्चे-पक्के मकानों की इस परिभाषा के चलते बड़े राज्यों के गरीब सस्ती आवास योजनाओं का लाभ लेने में लगातार पिछड़ रहे हैं।
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अनाज के कटोरे का पानी सूखा
- पूर्वी उत्तर प्रदेश में पेयजल तक का संकट गहराया
- धान की रोपाई पर सबसे ज्यादा असर
मध्य प्रदेश की सोयाबीन पट्टी हुई सूनी
मानसून की बारिश से पूरा देश भले ही बल्ले-बल्ले कर रहा हो, लेकिन खाद्यान्न उत्पादन में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश के बड़े हिस्से में सूखे जैसी हालत पैदा हो गई है। बिहार में ४३ फीसदी कम बारिश हुई, लेकिन चुनावी साल होने के चलते वहां के राजनीतिक दल अपनी-अपनी रोटी सेंक रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश प्रधानमंत्री से पांच हजार करोड़ मांग गये है। राजनीतिक हासिये पर पहुंच चुके लोजपा नेता राम विलास पासवान राज्यसभा में केंद्र से बिहार के लिे १५ हजार करोड़ रुपये मांग रहे है। भला हो पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों का, जहां के ज्यादातर जिलों में ६५ फीसदी तक कम बारिश हुई है। धान की रोपाई तो दूर, खेत में पुनपुना रही जोन्हरी (मक्का) भी मुरझाये पड़ी है। लेकिन उनकी राज्य सरकार को उनके बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं है। संसद में सूखे रेवडि़यों के लिए मारा मारी मची है। केंद्र सरकार की कांग्रेस भी चुटकी लेने से बाज नहीं आई। कहा वहां से कोई मांग ही नहीं आ रही है। भला एसे में केंद्र क्या कर सकता है।
मौसम विभाग ने शुक्रवार को साफ कर दिया कि इन इलाकों में बारिश औसत से कम रहेगी। यहां बादल बरसेंगे भी तो सितंबर में। यानी तब तक खरीफ खेती की संभावनाएं खत्म हो चुकी होंगी।
मौसम विभाग ने अगस्त व सितंबर माह में होने वाली बारिश के पूर्वानुमान के बारे में बताया कि बंगाल की खाड़ी में बनने वाला कम दबाव का क्षेत्र पूरी तरह विकसित होकर आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इसी वजह से पूरब से आने वाली मानसूनी हवाएं पूर्वी राज्यों में बारिश नहीं ला पा रही हैं। यही वजह है कि इस पूरे इलाके में अभी भी 24 फीसदी कम बारिश हुई है। जबकि बीते सप्ताह झारखंड में 46 फीसदी, बिहार में 29 फीसदी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में 32 फीसदी कम बारिश हुई। जबकि पश्चिमी मध्य में 26 फीसदी और पूर्वी मध्य प्रदेश में 18 फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड की गई। इससे धान की रोपाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। मध्य प्रदेश में सोयाबीन की बुवाई नहीं हो पाई है।
इसके चलते धान की रोपाई में भारी कमी दर्ज की गई है। कृषि मंत्रालय पिछले साल के सूखे में हुई धान की रोपाई रकबा से तुलना कर अपनी पीठ ठोंक रहा है। जबकि वर्ष 2008 में इसी अवधि में हुई रोपाई से इस बार धान की खेती बहुत पीछे चल रही है। धान रोपाई का ताजा आंकड़ा 212 लाख हेक्टेयर है, जबकि वर्ष 2008 में यह आंकड़ा 231 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है। मौसम विज्ञानियों ने कहा कि मानसून की विदाई के वक्त सितंबर के आखिर तक भी इस पूरे इलाके में बारिश 10 फीसदी कम रहेगी। बिहार और झारखंड में राजनीतिक दलों ने राज्य को सूखाग्रस्त घोषित करने में बाजी मार ली है। पिछड़ा तो पूर्वी उत्तर प्रदेश।
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- धान की रोपाई पर सबसे ज्यादा असर
मध्य प्रदेश की सोयाबीन पट्टी हुई सूनी
मानसून की बारिश से पूरा देश भले ही बल्ले-बल्ले कर रहा हो, लेकिन खाद्यान्न उत्पादन में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश के बड़े हिस्से में सूखे जैसी हालत पैदा हो गई है। बिहार में ४३ फीसदी कम बारिश हुई, लेकिन चुनावी साल होने के चलते वहां के राजनीतिक दल अपनी-अपनी रोटी सेंक रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश प्रधानमंत्री से पांच हजार करोड़ मांग गये है। राजनीतिक हासिये पर पहुंच चुके लोजपा नेता राम विलास पासवान राज्यसभा में केंद्र से बिहार के लिे १५ हजार करोड़ रुपये मांग रहे है। भला हो पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों का, जहां के ज्यादातर जिलों में ६५ फीसदी तक कम बारिश हुई है। धान की रोपाई तो दूर, खेत में पुनपुना रही जोन्हरी (मक्का) भी मुरझाये पड़ी है। लेकिन उनकी राज्य सरकार को उनके बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं है। संसद में सूखे रेवडि़यों के लिए मारा मारी मची है। केंद्र सरकार की कांग्रेस भी चुटकी लेने से बाज नहीं आई। कहा वहां से कोई मांग ही नहीं आ रही है। भला एसे में केंद्र क्या कर सकता है।
मौसम विभाग ने शुक्रवार को साफ कर दिया कि इन इलाकों में बारिश औसत से कम रहेगी। यहां बादल बरसेंगे भी तो सितंबर में। यानी तब तक खरीफ खेती की संभावनाएं खत्म हो चुकी होंगी।
मौसम विभाग ने अगस्त व सितंबर माह में होने वाली बारिश के पूर्वानुमान के बारे में बताया कि बंगाल की खाड़ी में बनने वाला कम दबाव का क्षेत्र पूरी तरह विकसित होकर आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इसी वजह से पूरब से आने वाली मानसूनी हवाएं पूर्वी राज्यों में बारिश नहीं ला पा रही हैं। यही वजह है कि इस पूरे इलाके में अभी भी 24 फीसदी कम बारिश हुई है। जबकि बीते सप्ताह झारखंड में 46 फीसदी, बिहार में 29 फीसदी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में 32 फीसदी कम बारिश हुई। जबकि पश्चिमी मध्य में 26 फीसदी और पूर्वी मध्य प्रदेश में 18 फीसदी कम बारिश रिकॉर्ड की गई। इससे धान की रोपाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। मध्य प्रदेश में सोयाबीन की बुवाई नहीं हो पाई है।
इसके चलते धान की रोपाई में भारी कमी दर्ज की गई है। कृषि मंत्रालय पिछले साल के सूखे में हुई धान की रोपाई रकबा से तुलना कर अपनी पीठ ठोंक रहा है। जबकि वर्ष 2008 में इसी अवधि में हुई रोपाई से इस बार धान की खेती बहुत पीछे चल रही है। धान रोपाई का ताजा आंकड़ा 212 लाख हेक्टेयर है, जबकि वर्ष 2008 में यह आंकड़ा 231 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है। मौसम विज्ञानियों ने कहा कि मानसून की विदाई के वक्त सितंबर के आखिर तक भी इस पूरे इलाके में बारिश 10 फीसदी कम रहेगी। बिहार और झारखंड में राजनीतिक दलों ने राज्य को सूखाग्रस्त घोषित करने में बाजी मार ली है। पिछड़ा तो पूर्वी उत्तर प्रदेश।
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Sunday, June 20, 2010
आर्सेनिक से दूषित बोरो धान पर पाबंदी की तैयारी
हड्डियों के कमजोर होने का खतरा, दांत पीले पड़कर गिरने का खतरा और ऐसे ही न जाने कितने और बीमारियों का अंदेशा। चौंकिये नहीं, हम धूम्रपान या नशीले पदार्थो की बात नहीं कर रहे। बल्कि यह मसला उस चावल का है जिसमें आर्सेनिक यानी संखिया के अंश मिले हैं। पूर्वी राज्यों के मुख्य भोजन में शामिल बोरो चावल आर्सेनिक की मौजूदगी के कारण खतरनाक हो चला है। यह जोखिम अन्य चावलों पर लागू नहीं होता है। सरकार ने यह चेतावनी उन राज्यों को दे दी है, जहां बोरो धान की सिंचाई आर्सेनिक युक्त भूजल से होती है।
पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा, बिहार व पूर्वी क्षेत्रों में बोरो धान की खेती खरीफ की जगह रबी सीजन में होती है। पश्चिम बंगाल के कुल धान उत्पादन में बोरो धान की हिस्सेदारी 40 फीसदी है, जबकि असम में 35 फीसदी और बिहार में 20 फीसदी। असिंचित क्षेत्रों में नलकूप की सिंचाई के भरोसे पैदा होने वाले इस धान में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर से अधिक पाई गई है। इसका कुप्रभाव भी वहां देखने को मिल रहा है। इस बारे में पश्चिम बंगाल के कृषि विभाग के प्रमुख सचिव संजीव अरोड़ा ने बताया कि बोरो धान की खेती नदियों की घाटियों में होती है।
अरोड़ा का कहना है कि दरअसल खरीफ सीजन में धान की खेती मानसूनी बारिश से तैयार हो जाती है, लेकिन रबी सीजन में बोरो धान के लिए सिंचाई की सख्त जरूरत होती है। देश के पूर्वी राज्यों में गहरे नलकूप नहीं हैं, इसकी जगह कम गहराई से खींचे गये पानी में आर्सेनिक जैसा खतरनाक तत्व घुला हुआ है। उसकी सिंचाई से तैयार धान में भी आर्सेनिक पहुंचता है। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल के 75 विकास खंडों में बोरो धान की खेती होती है। सरकार ने इसे चरणबद्ध तरीके से बंद करने की योजना तैयार की है।
असम के ब्रह्मपुत्र नदी के इलाके में बोरो धान की जबर्दस्त खेती होती है, लेकिन नदियों के किनारे लगे नलकूपों से आर्सेनिक युक्त पानी से पूरी फसल दूषित हो गई है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस सिंचाई से आलू की खेती पर आर्सेनिक का कोई असर नहीं है। यह समस्या सिर्फ बोरो धान में ही है। बिहार में गंगा व अन्य नदियों के किनारे के आर्सेनिक भूजल वाले इलाके में बोरो खेती अब खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। बोरो खेती करने के विकल्पों में गहरे नलकूपों की जरूरत होगी, जिसके लिए किसान तैयार नहीं होते हैं। हालांकि केंद्र सरकार इसके लिए पर्याप्त सब्सिडी देने को राजी है।
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पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा, बिहार व पूर्वी क्षेत्रों में बोरो धान की खेती खरीफ की जगह रबी सीजन में होती है। पश्चिम बंगाल के कुल धान उत्पादन में बोरो धान की हिस्सेदारी 40 फीसदी है, जबकि असम में 35 फीसदी और बिहार में 20 फीसदी। असिंचित क्षेत्रों में नलकूप की सिंचाई के भरोसे पैदा होने वाले इस धान में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर से अधिक पाई गई है। इसका कुप्रभाव भी वहां देखने को मिल रहा है। इस बारे में पश्चिम बंगाल के कृषि विभाग के प्रमुख सचिव संजीव अरोड़ा ने बताया कि बोरो धान की खेती नदियों की घाटियों में होती है।
अरोड़ा का कहना है कि दरअसल खरीफ सीजन में धान की खेती मानसूनी बारिश से तैयार हो जाती है, लेकिन रबी सीजन में बोरो धान के लिए सिंचाई की सख्त जरूरत होती है। देश के पूर्वी राज्यों में गहरे नलकूप नहीं हैं, इसकी जगह कम गहराई से खींचे गये पानी में आर्सेनिक जैसा खतरनाक तत्व घुला हुआ है। उसकी सिंचाई से तैयार धान में भी आर्सेनिक पहुंचता है। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल के 75 विकास खंडों में बोरो धान की खेती होती है। सरकार ने इसे चरणबद्ध तरीके से बंद करने की योजना तैयार की है।
असम के ब्रह्मपुत्र नदी के इलाके में बोरो धान की जबर्दस्त खेती होती है, लेकिन नदियों के किनारे लगे नलकूपों से आर्सेनिक युक्त पानी से पूरी फसल दूषित हो गई है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस सिंचाई से आलू की खेती पर आर्सेनिक का कोई असर नहीं है। यह समस्या सिर्फ बोरो धान में ही है। बिहार में गंगा व अन्य नदियों के किनारे के आर्सेनिक भूजल वाले इलाके में बोरो खेती अब खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। बोरो खेती करने के विकल्पों में गहरे नलकूपों की जरूरत होगी, जिसके लिए किसान तैयार नहीं होते हैं। हालांकि केंद्र सरकार इसके लिए पर्याप्त सब्सिडी देने को राजी है।
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जलवायु परिवर्तन से सिर्फ नुकसान ही नहीं, नफा भी
जलवायु परिवर्तन के नुकसान ही नहीं फायदे भी हैं। कृषि क्षेत्र के जानकारों का दावा है कि भारत में खेती को इसका फायदा मिला है। वैश्विक स्तर पर गेहूं व चावल जैसे अनाज की पैदावार में बढ़ोतरी हुई है तो उसके पीछे जलवायु परिवर्तन का भी हाथ है। इस संबंध में हुए अध्ययन से यह तथ्य भी सामने आया है कि देश के कई हिस्सों का औसत तापमान बढ़ा तो कुछ जगहों पर घटा भी है। आईसीएआर के ताजा अध्ययन में इस तरह का खुलासा किया गया है।
कृषि मंत्रालय के अधीन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने अपने हाल के एक अध्ययन में यह खुलासा किया है। जलवायु में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ने से गेहूं, चावल और तिलहन की फसलों को जहां बहुत फायदा हुआ है, वहीं मक्का, ज्वार, बाजरा और गन्ने की फसल के लिए यह फायदेमंद नहीं रहा है।
अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक मौसम में भारी उतार चढ़ाव का सीधा असर खेती पर पड़ा है। महाराष्ट्र में प्याज की खेती का खास अध्ययन किया गया, जिसमें 1997 की रबी फसल में तापमान के बहुत बढ़ जाने से प्याज में गांठ नहीं पड़ी। इसी तरह अगले साल 1998 में भारी बारिश हो जाने खेत में खड़ी प्याज की फसल में कई तरह की बीमारियों का प्रकोप हो गया और फसल चौपट हो गई। यह सब जलवायु परिवर्तन का प्रभाव था।
इसी तरह हिमाचल प्रदेश का सेब उत्पादक क्षेत्र बदल गया। कम सर्दी और बर्फ कम पड़ने के चलते फसल का क्षेत्र परिवर्तित होने लगा है। कई ऐसे नये क्षेत्रों लाहौल और स्पीति में सेब की खेती होने लगी, जहां नहीं होती थी। आईसीएआर के अध्ययन में 1901 से 2005 के बीच के जलवायु के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि तापमान में वृद्धि पिछले पांच दशकों में सर्वाधिक हुई है।
आंकड़ों के विश्लेषण में हैरान करने वाले नतीजे सामने आये। देश के 47 प्रमुख स्थानों पर पिछले 50 सालों के तापमान के आंकड़ों में पाया गया कि केंद्रीय, दक्षिण और पूर्वोत्तर में तापमान बढ़ा है। इसके मुकाबले गुजरात, कोकण क्षेत्र, मध्य प्रदेश के पश्चिमोत्तर और पूर्वी राजस्थान का औसत तापमान घटा है।
2007 में गठित इंटर गवर्नमेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के नतीजे के मुताबिक तापमान में तीन डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से फसलों की उत्पादकता बढ़ सकती है। लेकिन आईसीएआर ने स्पष्ट किया है कि अगर तापमान इससे अधिक बढ़ तो खाद्यान्न की उत्पादकता पर विपरीत असर पड़ना तय है।
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कृषि मंत्रालय के अधीन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने अपने हाल के एक अध्ययन में यह खुलासा किया है। जलवायु में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ने से गेहूं, चावल और तिलहन की फसलों को जहां बहुत फायदा हुआ है, वहीं मक्का, ज्वार, बाजरा और गन्ने की फसल के लिए यह फायदेमंद नहीं रहा है।
अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक मौसम में भारी उतार चढ़ाव का सीधा असर खेती पर पड़ा है। महाराष्ट्र में प्याज की खेती का खास अध्ययन किया गया, जिसमें 1997 की रबी फसल में तापमान के बहुत बढ़ जाने से प्याज में गांठ नहीं पड़ी। इसी तरह अगले साल 1998 में भारी बारिश हो जाने खेत में खड़ी प्याज की फसल में कई तरह की बीमारियों का प्रकोप हो गया और फसल चौपट हो गई। यह सब जलवायु परिवर्तन का प्रभाव था।
इसी तरह हिमाचल प्रदेश का सेब उत्पादक क्षेत्र बदल गया। कम सर्दी और बर्फ कम पड़ने के चलते फसल का क्षेत्र परिवर्तित होने लगा है। कई ऐसे नये क्षेत्रों लाहौल और स्पीति में सेब की खेती होने लगी, जहां नहीं होती थी। आईसीएआर के अध्ययन में 1901 से 2005 के बीच के जलवायु के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि तापमान में वृद्धि पिछले पांच दशकों में सर्वाधिक हुई है।
आंकड़ों के विश्लेषण में हैरान करने वाले नतीजे सामने आये। देश के 47 प्रमुख स्थानों पर पिछले 50 सालों के तापमान के आंकड़ों में पाया गया कि केंद्रीय, दक्षिण और पूर्वोत्तर में तापमान बढ़ा है। इसके मुकाबले गुजरात, कोकण क्षेत्र, मध्य प्रदेश के पश्चिमोत्तर और पूर्वी राजस्थान का औसत तापमान घटा है।
2007 में गठित इंटर गवर्नमेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के नतीजे के मुताबिक तापमान में तीन डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से फसलों की उत्पादकता बढ़ सकती है। लेकिन आईसीएआर ने स्पष्ट किया है कि अगर तापमान इससे अधिक बढ़ तो खाद्यान्न की उत्पादकता पर विपरीत असर पड़ना तय है।
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